मकर संक्रांति का महत्व-क्‍यों मनाते हैं मकर संक्रांति?

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मकर संक्रांति का महत्व

मकर संक्रांति के त्यौहार को हम सब लोग धूम-धाम से मनाते है. लेकिन क्या आप को पता है मकर संक्रांति क्यों मनाते है और मकर संक्रांति का महत्व क्या है?

अगर आपको नहीं पता तो आज हम आपको इसके बारे में बताने वाले है.

मकर संक्रांति का महत्व
मकर संक्रांति का महत्व

हमारे हिन्‍दू धर्म में प्रत्येक मास को दो भागो में बांटा गया है, कृष्ण पक्ष और शुक्‍ल पक्ष. ठीक उसी तरह वर्ष को भी दो भागो में बांटा गया है,

उत्‍तरायण और दक्षिणायण. दोनों को मिलाने से एक वर्ष बनता है.

पौष मास में जब सूर्य देवता धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते है तब मकर संक्रांति का त्‍यौहार मनाया जाता है. मकर संक्रांति उन त्योहारों में से एक है जो की पुरे भारत में मनाया जाता है.

वैसे तो मकर संक्रांति का त्‍यौहार जनवरी महीने की 14 तारीख को मनाया जाता है, लेकिन कई बार इसको 13 या 15 तारीख को भी मनाया जाता है,

क्‍योंकि मकर संक्रांति को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के दिन मनाया जाता है और सूर्य देवता 13, 14 या 15 जनवरी में से किसी एक दिन मकर राशि में प्रवेश करते है.

मकर संक्रांति के दिन से सूर्य देवता की उत्‍तरायण की तरफ गति शुरू होती है, इसलिए मकर संक्रांति को उत्‍तरायण भी कई जगह बोला जाता है.

मकर संक्रांति को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है. तमिलनाडु में इसे पोंगल बोलते है, तो वही आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और केरला में संक्रांति बोलते है



और बिहार, उत्‍तरप्रदेश में ऐसे खिचड़ी के नाम से मनाया जाता है.

उत्‍तरायण को देवताओं का नया दिन बताया गया है. इसीलिए मकर संक्रांति दिन जप, दान, स्‍नान आदि का एक अलग महत्‍व है.

मकर संक्रांति के दिन सुबह आपको किसी तीर्थ स्थल पर जाकर नहाना चाहिए. आप तीर्थ स्थल पर नहीं जा सकते तो घर पे पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर नहाने से सूर्य राशि मजबूत होती है.

नहाने के बाद सूर्य देव को तांबे की लोटी से अर्ध्य जरूर देना चाहिए. बाद में आप अपने हिसाब से कुछ भी दान दे सकते है.

कहा जाता है कि इस दिन आप जो भी दान देते है उसका 100 गुना फल मिलता है.

क्‍यों मनाते हैं मकर संक्रांति?

हमारे ग्रंथो में मकर संक्रांति को मनाने के बारे में कई तरह की बातें बताई गयी है.

एक तथ्‍य के अनुसार सूर्य देवता पहली बार अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर गए थे और शनि देव मकर राशि के स्‍वामी है, इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति कहा जाता है. दूसरे तथ्य की बात करे तो, माना जाता है कि पवित्र गंगा नदी का इसी दिन धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए भी मकर संक्रांति का त्‍यौहार मनाया जाता है.

भीष्‍म पितामाह ने मकर संक्रांति के दिन ही स्‍वेच्‍छा से अपने शरीर का त्‍याग किया था और कहा जाता है कि उत्‍तरायण के दिन मृत्यु होने पर आपको दूसरा जन्म नहीं लेना पड़ता और पुनर्जन्‍म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है.

मकर संक्रांति के दिन क्‍यों उड़ाते हैं पतंग?

भारत में काफी सारे त्यौहार मनाये जाते है और उन त्‍यौहारों का संबंध कई तरह की मान्यताओं से जुड़ा हुआ है. जैसे दिवाली पर पटाखें फोड़ना, होली में रंगों से खेलना.

ठीक इसी तरह मकर संक्रांति पर पतंग उड़ने की मान्यता है.

अनेक जगहों पर मकर संक्रांति के दिन पतंगे उड़ाई जाती है. लोग पुरे दिन अपनी छतों पर पतंग उड़ाकर हर्ष और उल्‍लास के साथ इस त्यौहार को मनाते है.

हालांकि हमारे पुराणों के अनुसार पतंग उड़ाने का मकर संक्रांति से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है.

मकर संक्रांति के दिन क्‍यों खाते हैं तिल और गुड़?

हमारे भारत में हर त्योहार पर अलग-अलग पकवान बनाने और खाने की परंपरा है. मकर संक्रांति के त्यौहार पर तिल और गुड़ के पकवान बना के खाने की परंपरा है.

तिल और गुड़ को मकर संक्रांति के त्यौहार पर क्यों खाया जाता है उनका एक वैज्ञानिक कारण है.

January महीने में सदियों का मौसम होता है, तब हमारे शरीर को गर्मी की जरूरत होती है. तिल और गुड़ ये काम बखूबी करते है,

इन दोनों चीजों का सेवन करने से हमारे शरीर में पर्याप्त मात्रा में गर्माहट बनी रहती है.

मुझे आशा है कि इस आर्टिकल में आपको मकर संक्रांति के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला होगा. आपको ये आर्टिकल पसंद आया हो तो Social Media पर Share करे.

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